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‘राज्यपाल’ विवाद : राजनीति ने संवैधानिक पद को बदनाम किया…?

-ओमप्रकाश मेहता-

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

आज आजादी के 75 साल बाद देश के शिक्षित व जागरूक नागरिकों के दिल दिमाग में एक अहम सवाल बेचैनी पैदा कर रहा है और वह यह है कि क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने देश की राजनीति की भावी पीढ़ी की सोच की कल्पना नहीं की थी या हमारी आज की पीढ़ी सोच के मामले में उस पीढ़ी से आगे निकल गई है, यह विचार आज हमारे मौजूदा संविधान को लेकर उठाया गया है, जिसमें सिर्फ विश्व को दिखावे भर के लिए देश का सर्वोच्च प्रशासक राष्ट्रपति जी को दिखाया गया है, जबकि वास्तव में आज राष्ट्रपति की नियुक्ति ही प्रधानमंत्री की पसंद से होती है और यही स्थिति राज्यों की सत्ता के संवैधानिक प्रमुख राज्यपालों की है, इसी गलत परंपरा के कारण आज यदि यह कहा जाए कि “केंद्रीय ढांचा डगमगाता नजर आता है”, तो कतई गलत नहीं होगा, अर्थात आज इसलिए हर कहीं यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं हमारा देश “तानाशाही तंत्र” की और तो नहीं बढ़ रहा है?

आज एक और जहां विश्व के सबसे बड़े हमारे प्रजातांत्रिक मूल्क के संविधान को ‘आदर्श’ मानकर कई देश उसके अनुरूप अपने आप को ढालने का प्रयास कर रहे हैं, वही हमारे देश में हर कहीं यह महसूस किया जा रहा है कि पूरे देश का शिखर से लेकर जमीन तक का पूरा प्रशासन प्रधानमंत्री के हाथों में है और संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति या राज्यों के राज्यपाल पद को भी वही सुशोभित करता है, जिसे प्रधानमंत्री चाहते हैं?

मुझे वह जमाना भी याद है जब देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपना नाम रोशन करने वाली महान हस्तियों को राज्यपाल का दायित्व सौंपा जाता था, फिर वह साहित्य, संस्कृति, सामाजिक या राजनीति किसी भी क्षेत्र से जुड़ी क्यों ना हो? और वही संविधान को सोच समझकर उसका उपयोग कर उसके अनुरूप राज्य के शिखर की भूमिका का निर्वहन करते थे, किंतु आज तो स्थिति यह हो गई है कि राजनीति के घीसे पीटे मोहरो या फिर कठपुतली की भूमिका निभाने वाले नाकारा राजनेताओं को राज्यपाल का दायित्व सौंप दिया जाता है और फिर अपने आकाओं के इशारों पर वे संवैधानिक पद की मर्यादा भंग करते नजर आते हैं।

इसका ताजा उदाहरण दिल्ली और महाराष्ट्र का है जहां राजनीतिक विवादों के चलते राज्यपालों ने हस्तक्षेप किया और सर्वोच्च न्यायालय को इस पर तीखी टिप्पणी करनी पड़ी। महाराष्ट्र की सियासी लड़ाई के दौर में राज्यपाल का हस्तक्षेप बिल्कुल गलत है और खासकर वह भी “फ्लोर टेस्ट” को लेकर। क्योंकि गतिरोध का समाधान ‘फ्लोर टेस्ट’ से नहीं होता। पार्टी के आंतरिक गतिरोध का निपटारा करने के लिए ‘फ्लोर टेस्ट’ का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, साथ ही राज्यपाल को किसी पार्टी के आंतरिक कलह में भूमिका निभाने का कोई अधिकार संविधान ने नहीं दिया है। संविधान और कानून राज्यपाल को इस बात की इजाजत नहीं देता है कि वह राजनीतिक लड़ाई में दखल दें और किसी दल विशेष के प्रति विशेष लगाव प्रदर्शित करें। यह संवैधानिक व कानूनी दोनों दृष्टियों से गलत है।

महाराष्ट्र के राजनीतिक विवाद के बारे में सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि तत्कालीन उद्धव सरकार को बहाल नहीं किया, मौजूदा महाराष्ट्र सरकार बरकरार रहेगी, तत्कालीन राज्यपाल कोश्यारी के उद्धव सरकार को फ्लोर टेस्ट के लिए निर्देश भी गलत थे। इसी प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले में राज्यपाल के दायित्व व उनके कार्यों को लेकर काफी कुछ कहा गया। दिल्ली की मौजूदा सरकार के तथा वहां के उपराज्यपाल के संबंधों व दिल्ली सरकार के अधिकारों व कर्तव्यों में राज्यपाल के अनाधिकृत हस्तक्षेप को लेकर भी सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र व उपराज्यपाल को संवैधानिक कटघरे में खड़ा किया तथा दिल्ली सरकार को उसके मूल अधिकार वापस दिलाए। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने इशारों इशारों में यह स्पष्ट कर दिया कि देश का संविधान मूल रूप से किस की कैद में है तथा उसका राजनेता राज्यपाल किस तरह दुरुपयोग के माध्यम बने हुए है।

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